दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बैंक खाते फ्रीज करना असंवैधानिक

दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनवरी 2026 में एक ऐतिहासिक और नागरिक अधिकारों को मजबूती देने वाला फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पुरुषैन्द्र कुमार कौरव ने स्पष्ट किया कि पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी अदालत की पूर्व अनुमति के बिना बैंक खाते फ्रीज नहीं कर सकती। अदालत ने इसे व्यापार, आजीविका और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना।
BNSS की धारा 107 का पालन अनिवार्य
कोर्ट ने कहा कि बैंक अकाउंट को अटैच या फ्रीज करने की कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 107 के तहत ही की जा सकती है और इसके लिए सक्षम मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य है। धारा 106 के तहत पुलिस को खाते डेबिट-फ्रीज करने का कोई अधिकार नहीं है।
सिर्फ संदेह पर खाता फ्रीज करना गलत
न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि यदि खाताधारक की मिलीभगत या आपराधिक संलिप्तता का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो केवल संदेह या किसी तीसरे पक्ष की जांच के आधार पर बैंक अकाउंट फ्रीज करना मनमाना और गैरकानूनी है।
व्यवसाय पर पड़ता है गंभीर असर
कोर्ट ने माना कि अंधाधुंध तरीके से बैंक खाते फ्रीज करने से किसी भी कंपनी या संस्था का पूरा व्यवसाय ठप्प हो जाता है। कर्मचारियों के वेतन भुगतान, दैनिक लेनदेन और व्यावसायिक प्रतिष्ठा पर इसका गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।








