सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला विवाद: महिलाओं के प्रवेश पर 9 जजों की बेंच में सुनवाई शुरू

महिलाओं के प्रवेश पर 9 जजों की बेंच में सुनवाई शुरू

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केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार से गहन सुनवाई शुरू कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में गठित 9 जजों की संविधान पीठ ने अब तक 5 घंटे की सुनवाई पूरी की।
2018 में पांच जजों की पीठ ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार दिया था, लेकिन मंदिर के पुजारियों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा दायर पुनर्विचार याचिकाओं के कारण यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच के सामने है।

सुनवाई में केंद्र की दलील
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता से जुड़ा है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर न्यायिक हस्तक्षेप न किया जाए।
केंद्र ने मुख्य बिंदु दिए: हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान होना चाहिए। अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई प्रथा तर्कसंगत या वैज्ञानिक है या नहीं। संवैधानिक समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत संसद के पास है। केवल ऐसी प्रथाओं पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता के खिलाफ हों। धर्म में कई मान्यताएं और प्रथाएं सामान्य तर्क से मेल नहीं खातीं, इसलिए उन्हें अदालत से न्यायिक समीक्षा की सीमाओं में आंका जाना चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान ‘अछूत’ मानने की प्रथा पर संवैधानिक अनुच्छेद 17 के तहत दलील देना चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई धार्मिक प्रथा के नाम पर चल रही है, तो अदालत उस पर हस्तक्षेप कर सकती है।

सुनवाई के प्रमुख मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच इस सुनवाई में पाँच प्रमुख मुद्दों पर फैसला करेगी:
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: 2018 के फैसले की वैधता तय होगी।
दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना: 2017 में दायर याचिका पर निर्णय।
मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: 2016 में मुस्लिम महिलाओं की याचिका।
पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में विवाह के बाद पारसी महिलाओं का प्रवेश।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में लैंगिक भेदभाव: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर आधारित भेदभाव का संविधानिक दृष्टिकोण।

सुनवाई की प्रक्रिया और समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू याचिकाकर्ताओं को 7 से 9 अप्रैल तक दलीलें पूरी करने के लिए समय दिया, जबकि विरोधी पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपनी दलील पेश करेंगे। इस सुनवाई में कुल 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर अंतिम फैसला होना है।

सुप्रीम कोर्ट बेंच में कौन हैं शामिल?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में 9 जजों की बेंच में शामिल हैं:
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना,
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश,
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह,
जस्टिस अरविंद कुमार,
जस्टिस ए.जी. मसीह,
जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले,
जस्टिस आर. महादेवन,
जस्टिस जॉयमाल्य बागची,

क्या बदलेगा अगर फैसला बरकरार रहा?
अगर सुप्रीम कोर्ट पुराने फैसले को बरकरार रखती है, तो: 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाएं सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। अन्य धर्मों और समुदायों में महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर भी समान कानूनी सिद्धांत लागू होंगे। धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन बनाने में न्यायिक दिशा स्पष्ट होगी।

सबरीमाला मामला केवल एक मंदिर के प्रवेश का विवाद नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक हस्तक्षेप और लैंगिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। देश की सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय का असर आने वाले दशकों तक भारत में धार्मिक और सामाजिक संरचना पर रहेगा।