लोकसभा में BSNL पर बवाल: प्रणीति शिंदे ने उठाए सवाल
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संसद के गलियारों से उठी यह आवाज़ अब देश के करोड़ों उपभोक्ताओं की चिंता बन चुकी है। महाराष्ट्र के सोलापुर से कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे ने लोकसभा में भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) की खराब स्थिति को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने कहा कि देश के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग बेसिक नेटवर्क के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो डिजिटल इंडिया के दावों पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी ठप्प
प्रणीति शिंदे ने विशेष रूप से सोलापुर जिले के अक्कलकोट तालुका का मुद्दा उठाया, जहां BSNL की सेवाएं लगभग ठप हो चुकी हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलिंग और इंटरनेट दोनों प्रभावित, सीमावर्ती इलाकों में संचार व्यवस्था कमजोर, डिजिटल सेवाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा, यह स्थिति न केवल आम लोगों के लिए परेशानी है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक कार्यों को भी प्रभावित कर रही है।
“टावर लगाने के लिए पैसे नहीं” – अधिकारियों का जवाब
सांसद ने बताया कि जब इस समस्या को लेकर अधिकारियों से बात की गई, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था— “हमारे पास नए टावर लगाने के लिए पैसे नहीं हैं।” यह बयान BSNL की आर्थिक स्थिति और सरकारी समर्थन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
निजीकरण का आरोप और सियासी हमला
प्रणीति शिंदे ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जानबूझकर BSNL को मजबूत नहीं कर रही है, ताकि निजी टेलीकॉम कंपनियों को फायदा मिल सके। फंडिंग में कमी का आरोप, इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड में देरी, निजी कंपनियों के लिए बाजार तैयार करने का दावा, यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन गया है।
सरकार का जवाब: निजीकरण से इनकार
इस पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्पष्ट किया कि सरकार BSNL के निजीकरण की योजना नहीं बना रही है।
उन्होंने कहा: BSNL को सार्वजनिक क्षेत्र में ही रखा जाएगा, देशभर में 1 लाख से अधिक 4G टावर लगाए जा रहे हैं, 4G नेटवर्क स्थिर होने के बाद 5G सेवा शुरू की जाएगी, सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि महाराष्ट्र के कई ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी की समस्या है, जिसे जल्द दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या सच में निजी कंपनियों को मिल रहा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर BSNL की स्थिति में सुधार नहीं होता, तो इसका सीधा फायदा निजी टेलीकॉम कंपनियों को मिलेगा। ग्रामीण बाजार में निजी कंपनियों की पकड़ मजबूत हो सकती है, प्रतिस्पर्धा कम होने से उपभोक्ताओं पर असर पड़ सकता है, सरकारी टेलीकॉम सेक्टर की भूमिका कमजोर हो सकती है,
BSNL का भविष्य: सवालों के घेरे में
BSNL कभी देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी हुआ करती थी, लेकिन आज फंडिंग, टेक्नोलॉजी और प्रतिस्पर्धा के कारण पीछे छूटती जा रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि:
क्या सरकार BSNL को फिर से मजबूत बनाएगी?
क्या ग्रामीण भारत को बेहतर कनेक्टिविटी मिल पाएगी?
या फिर निजी कंपनियां पूरी तरह बाजार पर कब्जा कर लेंगी?
लोकसभा में उठी यह बहस केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की समस्या है। आने वाले समय में सरकार के फैसले यह तय करेंगे कि BSNL देश की डिजिटल रीढ़ बनेगा या इतिहास बनकर रह जाएगा।



