घरेलू कामों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “पत्नी नौकरानी नहीं, जीवनसाथी है”

“पत्नी नौकरानी नहीं, जीवनसाथी है”

Comments

No comments yet. Be the first!

कामकाज को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समाज को आईना दिखाते हुए बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि आज के समय में पति को भी घर के कामों में पत्नी का बराबर साथ देना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि शादी का मतलब किसी नौकरानी से नहीं बल्कि एक जीवनसाथी से होता है। ऐसे में खाना बनाना, सफाई करना या कपड़े धोना केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है।

‘खाना न बनाना क्रूरता नहीं’

अदालत ने साफ किया कि अगर पत्नी खाना नहीं बनाती या घरेलू काम ठीक से नहीं कर पाती, तो इसे ‘मानसिक क्रूरता’ का आधार नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी उस समय आई जब पति ने इसी आधार पर तलाक की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पत्नी का व्यवहार अनुचित था और वह घर के काम नहीं करती थी। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पति को भी इन जिम्मेदारियों में बराबर भागीदारी निभानी चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक दंपति से जुड़ा है, जिनकी शादी साल 2017 में हुई थी और 2019 से वे अलग रह रहे हैं। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने शादी के कुछ समय बाद ही उसका और उसके परिवार का अपमान करना शुरू कर दिया और घर के काम करने से इनकार कर दिया।

वहीं पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उस पर दहेज की मांग का दबाव बनाया गया और उसके साथ गलत व्यवहार किया गया।

निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक मामला

परिवार न्यायालय ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया था। लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया। इसके बाद पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा, लेकिन मामला सुलझ नहीं सका। अब अदालत ने दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है और अगली सुनवाई 27 अप्रैल तय की है।

सामाजिक संदेश

इस टिप्पणी के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि बदलते समय के साथ वैवाहिक रिश्तों में बराबरी और साझेदारी बेहद जरूरी है। घरेलू काम केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पति-पत्नी दोनों की समान जिम्मेदारी है।

खबरे और भी है...