80 साल के संयुक्त राष्ट्र पर सवाल: अमेरिका के निशाने पर यूएन, ट्रंप ने बताया ‘नाकाम संस्था’

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संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) अपनी स्थापना की 80वीं वर्षगांठ ऐसे समय मना रहा है, जब उसकी भूमिका और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यूक्रेन, गाजा, सूडान और म्यांमार जैसे वैश्विक संघर्षों, जलवायु संकट और आर्थिक असमानता के बीच यूएन की निष्क्रियता ने इसकी विश्वसनीयता को कमजोर किया है।
इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर संयुक्त राष्ट्र को “नाकाम संस्था” करार देते हुए इसकी उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने न सिर्फ यूएन की आलोचना तेज की है, बल्कि कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थानों से दूरी भी बनाई है।
भारत ने क्यों बढ़ाई सक्रियता?
इन वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बड़ी और निर्णायक भूमिका निभाने की इच्छा जाहिर की है। सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूएन इस समय संकट में है।
जयशंकर के अनुसार,
“जब संघर्ष शांति को खतरे में डालते हैं, जब संसाधनों की कमी विकास को रोकती है और जब आतंकवाद मानवाधिकारों का हनन करता है, तब संयुक्त राष्ट्र गतिरोध में फंसा रहता है।”
उन्होंने कहा कि बहुपक्षवाद में विश्वास कम हो रहा है और इसका मुख्य कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों का अभाव है।
सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग
वर्तमान में सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) और 10 अस्थायी सदस्य हैं। भारत का मानना है कि 1945 की वैश्विक व्यवस्था के अनुसार बनी यह संरचना आज के विश्व का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती।
भारत ने साफ कहा है कि जब तक स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं का विस्तार नहीं होगा, तब तक यूएन प्रासंगिक नहीं रह पाएगा। इस सुधार प्रक्रिया में भारत पूरी जिम्मेदारी निभाने को तैयार है।
भारत की वैश्विक भूमिका
जयशंकर ने अपने भाषण में यह भी रेखांकित किया कि संकट के समय भारत हमेशा आगे रहा है—
अफगानिस्तान और म्यांमार में आपदा राहत,
अरब सागर में सुरक्षित व्यापार के लिए भारतीय नौसेना की तैनाती,
आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख,
हाल ही में यूएन जनरल असेंबली की अध्यक्ष एनालेना बेरबॉक ने भी भारत को स्थायी सदस्य बनाने की खुलकर पैरवी की है। उनके अनुसार, भारत जैसे देशों को स्थायी सदस्यता मिलने से यूएन की विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।
80 साल: संकट या अवसर?
संयुक्त राष्ट्र के सामने वित्तीय संकट भी गंभीर है। अरबों डॉलर के बकाया और घटते योगदान ने संगठन की कार्यक्षमता को प्रभावित किया है। ऐसे में भारत ने स्थिर वित्त पोषण और संरचनात्मक सुधारों का समर्थन किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूएन का 80वां वर्ष केवल आत्ममंथन नहीं, बल्कि नेतृत्व और सुधार का अवसर है—और भारत इस भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार दिखाई देता है।







