सुनवाई के दौरान गरमाया मामला: दिल्ली हाई कोर्ट में Arvind Kejriwal का बड़ा बयान
Saanvi Pandey
1 घंटे पहलेKya koi aur khabar bhi aane wali hai is topic par?
Trapti Tanwar
1 घंटे पहलेYeh khabar bahut important hai, sabko pata honi chahiye!
Ayaan Khan
5 घंटे पहलेYeh padh ke ankhe khul gayi, sabko dikhao.
Tanya Bajaj
5 घंटे पहलेPehli baar itni sach khabar padhi, shukriya!
Vaishali shinde
8 घंटे पहलेPeedit logo ke saath poori tarah sahmat hoon.
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से जुड़ा एक बयान इन दिनों राजनीतिक और कानूनी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही एक अहम सुनवाई के दौरान केजरीवाल ने जज की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए, जिसके बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया। कोर्टरूम में कही गई इस बात ने न्यायपालिका और राजनीति के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
RSS कार्यक्रमों में शामिल होने का दावा बना विवाद
सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल की ओर से यह दावा किया गया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ी संस्था ‘अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में चार बार शामिल हो चुकी हैं। इस दावे के आधार पर केजरीवाल ने आशंका जताई कि उन्हें निष्पक्ष न्याय नहीं मिल पाएगा, क्योंकि वह खुद RSS और BJP की विचारधारा के आलोचक रहे हैं।
जज से केस से हटने की मांग
जानकारी के मुताबिक यह मामला शराब घोटाले से जुड़े केस में CBI याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। अरविंद केजरीवाल ने खुद अदालत में पेश होकर जज से मामले की सुनवाई से अलग होने यानी Recusal की मांग की। उनका कहना था कि यदि न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हों, तो निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है।
कोर्ट ने आरोपों को बताया कल्पना
मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने साफ कहा कि क्या किसी जज को कानूनी कार्यक्रमों में शामिल होने से रोक दिया जाए? उन्होंने कहा कि किसी राजनेता के बयानों या धारणाओं के आधार पर जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाना पूरी तरह कल्पना पर आधारित है। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी।
कानून बनाम राजनीति की बहस फिर तेज
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर कानून और राजनीति के रिश्ते पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत में बोले गए हर शब्द का असर सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं होता, बल्कि पूरे सिस्टम और समाज पर पड़ता है। ऐसे मामलों में न्यायपालिका की गरिमा, पारदर्शिता और जनता के भरोसे को बनाए रखना बेहद अहम माना जाता है।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायिक निष्पक्षता से जुड़ा जरूरी सवाल बता रहे हैं, जबकि कई लोग इसे अदालत की गरिमा को चुनौती देने वाला कदम मान रहे हैं।




