13 करोड़ का बजट: लेकिन काम शून्य

लेकिन काम शून्य

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बिहार में विकास के दावों के बीच डेहरी से पटना को जोड़ने वाला ‘पाली पुल’ (पाली-मकराइन रेलवे ओवरब्रिज) पिछले तीन सालों से अधूरा पड़ा है। यह पुल स्थानीय लोगों के लिए सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि जीवन रेखा माना जाता है। क्षेत्र के लोगों के लिए यह पुल समय और दूरी दोनों बचाने का महत्वपूर्ण मार्ग था।
लेकिन 2026 आते-आते यह पुल सिर्फ अधूरा निर्माण और कचरे के ढेर में बदल गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुल के अधूरे होने के कारण उन्हें रोजमर्रा के कामों के लिए कई किलोमीटर का लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ता है। इसके अलावा, बारिश या खराब मौसम में इस मार्ग पर यात्रा करना बेहद जोखिम भरा हो जाता है।

13 करोड़ का बजट, लेकिन काम ठप्प
इस परियोजना के लिए 13.08 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट स्वीकृत किया गया था। यह राशि स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा इस उम्मीद के साथ जारी की गई थी कि पुल समय पर पूरा होगा और जनता के पैसे का सही उपयोग होगा।
लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्माण कार्य की गति अत्यंत धीमी रही। सितंबर 2025 की डेडलाइन बीत चुकी है, और अब 2026 में भी कार्य अधूरा पड़ा है। पुल निर्माण स्थल पर गंदगी, निर्माण सामग्री के ढेर और जर्जर संरचनाओं का दृश्य आम हो गया है। इस स्थिति ने स्थानीय जनता में नाराजगी और निराशा दोनों बढ़ा दी है।

स्थानीय लोगों की परेशानियाँ
पाली पुल के न बनने से डेहरी और पटना के बीच आवागमन करने वाले लोग लंबा और कठिन मार्ग अपनाने को मजबूर हैं। रोहतास और आसपास के जिलों के लोगों को अब वैकल्पिक मार्गों से गुजरना पड़ता है, जो समय और ईंधन दोनों की बर्बादी करता है।
स्थानीय व्यापारी भी इससे प्रभावित हुए हैं। उनका कहना है कि अधूरा पुल व्यापारिक आवाजाही को रोक रहा है, जिससे रोज़मर्रा के काम-काज और माल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। छात्रों और दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों को भी लंबे समय तक रोज़ाना अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।

अधिकारियों की जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
यह मामला केवल पुल का नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही और जनता के पैसों की सुरक्षा का है। लगातार देरी और काम की सुस्ती ने स्थानीय लोगों में सरकार और संबंधित विभागों के प्रति विश्वास कम कर दिया है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे अधूरे प्रोजेक्ट न सिर्फ जनता की परेशानियों को बढ़ाते हैं, बल्कि सरकार की छवि पर भी असर डालते हैं। सवाल उठता है – आखिर कब तक ऐसे प्रोजेक्ट्स में लापरवाही और समय सीमा की अनदेखी होती रहेगी?

भविष्य में परियोजना की संभावनाएँ
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तत्काल कार्य शुरू नहीं किया गया, तो यह परियोजना केवल बजट का बोझ बनकर रह जाएगी। तकनीकी और वित्तीय दृष्टिकोण से परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए ठोस योजना बनानी होगी।
स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों की आशा है कि राज्य सरकार इस परियोजना को प्राथमिकता दे और जल्द से जल्द पुल को पूरी तरह functional बनाए। केवल तभी डेहरी-पटना कनेक्टिविटी सुचारू रूप से स्थापित हो सकेगी और जनता का विश्वास विकास के दावों पर कायम रह सकेगा।

पाली पुल सिर्फ एक पुल नहीं है, बल्कि जनता की उम्मीद और उनके पैसों की सुरक्षा का प्रतीक है। 13 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के बावजूद अधूरा पुल यह दर्शाता है कि बिहार में विकास के नाम पर अभी भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। अब सवाल यह है – क्या सरकार इस परियोजना को समय रहते पूरा करके जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगी, या यह पुल सिर्फ कागजों और बजट की कहानी बनकर रह जाएगा?

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