NCDRC का बड़ा फैसला: गलत किडनी निकालने वाले डॉक्टर पर 2 करोड़ रुपये का जुर्माना

Sonu rai
0 सेकंड पहलेYeh mudda rajneeti se upar hai, insaniyat ki baat hai.
Neha Tripathi
0 सेकंड पहलेCommunity ko mil ke aage aana hoga is mudde par.
उत्तर प्रदेश में मेडिकल लापरवाही के एक बेहद गंभीर मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक डॉक्टर को 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। मामला वर्ष 2012 का है, जब एक महिला की खराब दाहिनी किडनी निकालने के बजाय डॉक्टर ने उसकी स्वस्थ बाईं किडनी निकाल दी थी। इस गंभीर चिकित्सीय त्रुटि के कारण महिला को वर्षों तक डायलिसिस पर रहना पड़ा और अंततः उसकी मृत्यु हो गई।
पेट दर्द की शिकायत से शुरू हुई त्रासदी
जानकारी के अनुसार, 56 वर्षीय शांति देवी पेट दर्द की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास पहुंची थीं। जांच में उनकी दाहिनी (राइट) किडनी में गंभीर हाइड्रोनेफ्रोसिस की समस्या पाई गई थी। मेडिकल रिपोर्ट और परीक्षणों में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि दाहिनी किडनी खराब है और उसे हटाने की आवश्यकता है, जबकि बाईं किडनी पूरी तरह स्वस्थ थी।
6 मई 2012 को महिला की सर्जरी की गई। परिवार को बताया गया कि खराब किडनी निकाल दी गई है, लेकिन बाद में सामने आए तथ्यों ने सभी को स्तब्ध कर दिया।
जांच में सामने आया चौंकाने वाला सच
ऑपरेशन के कुछ सप्ताह बाद भी महिला की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। जून 2012 में कराए गए सीटी स्कैन और रेडियोलॉजिकल जांच में पता चला कि महिला की खराब दाहिनी किडनी अब भी शरीर में मौजूद है, जबकि स्वस्थ बाईं किडनी निकाल दी गई थी। इस खुलासे के बाद परिवार ने डॉक्टर के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की, जो वर्षों तक चली।
सुनवाई में डॉक्टर ने भी स्वीकार की गलती
मामले की सुनवाई के दौरान डॉक्टर ने स्वीकार किया कि ऑपरेशन के लिए दाहिनी ओर चीरा लगाया गया था, लेकिन बाईं किडनी निकाल दी गई। आयोग ने इस स्वीकारोक्ति को अत्यंत गंभीर माना और कहा कि सभी मेडिकल रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट और उपचार प्रक्रिया दाहिनी किडनी की बीमारी को दर्शा रही थीं, फिर भी स्वस्थ किडनी निकाल दी गई।
दो साल तक डायलिसिस पर रहीं महिला, फिर हुई मौत
गलत सर्जरी के बाद महिला की स्थिति लगातार बिगड़ती गई। स्वस्थ किडनी हट जाने और खराब किडनी शरीर में बने रहने के कारण उन्हें लगभग दो वर्षों तक नियमित डायलिसिस कराना पड़ा। लंबी चिकित्सीय पीड़ा के बाद 20 फरवरी 2014 को उनकी मृत्यु हो गई। आयोग ने माना कि यदि स्वस्थ किडनी सुरक्षित रहती, तो महिला का जीवन बचाया जा सकता था।
NCDRC ने कहा- यह चिकित्सा जगत की सबसे गंभीर लापरवाहियों में से एक
NCDRC के अध्यक्ष ए.पी. साही और सदस्य भारतकुमार पंड्या की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यह लापरवाही के सबसे गंभीर और दुर्लभ मामलों में से एक है। आयोग ने टिप्पणी की कि अदालतों और न्यायाधिकरणों के सामने ऐसे मामले बहुत कम आते हैं, जहां चिकित्सीय चूक का स्तर इतना गंभीर हो।
मेडिकल काउंसिल ने भी डॉक्टर को माना दोषी
मामले की जांच के दौरान उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी डॉक्टर को चिकित्सा लापरवाही का दोषी पाया था। उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने डॉक्टर का पंजीकरण दो वर्षों के लिए निलंबित कर दिया था। जांच में यह भी सामने आया कि बचाव पक्ष की ओर से एक कथित फर्जी केस शीट प्रस्तुत की गई थी।
परिवार को मिलेगा 2 करोड़ रुपये का मुआवजा
आयोग ने डॉक्टर को कुल 2 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। इसमें 1.5 करोड़ रुपये मेडिकल लापरवाही के लिए मुआवजे के रूप में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त परिवार के सदस्यों को प्रेम, स्नेह और वैवाहिक जीवन की क्षति के लिए 10-10 लाख रुपये दिए जाएंगे। साथ ही 1 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने होंगे। आयोग ने आदेश दिया है कि पूरी राशि तीन महीने के भीतर अदा की जाए। निर्धारित समय में भुगतान न होने की स्थिति में ब्याज भी देय होगा।
मेडिकल जवाबदेही पर महत्वपूर्ण संदेश
यह फैसला केवल एक परिवार को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र में जवाबदेही और मरीजों की सुरक्षा के महत्व को भी रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय मेडिकल नेग्लिजेंस के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है और स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक सावधानी तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा संदेश देता है।







