जिस उंगली को पकड़कर चलना सिखाया: रायबरेली में बुजुर्ग की सिसकियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं
पहले आप अपनी बात रखें
उत्तर प्रदेश के रायबरेली से एक हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत और पारिवारिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस पिता ने अपने बेटे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ाया-लिखाया और अपनी पूरी जिंदगी उसकी परवरिश में खपा दी — उसी बेटे ने बुढ़ापे में उसे बीच सड़क पर लावारिस छोड़ दिया। आज वही बुजुर्ग पिता दर-दर भटकने को मजबूर हैं। उनकी सिसकियाँ सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते समाज की कड़वी हकीकत बयां कर रही हैं।
लाचार पिता की दर्दभरी दास्तान
जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग पिता ने अपनी पूरी जमापूंजी, खेत-खलिहान और मेहनत की कमाई बेटे के भविष्य के नाम कर दी। बेटे को पढ़ाया, बड़ा बनाया और समाज में स्थापित किया। लेकिन बुढ़ापे में जब सहारे की जरूरत पड़ी, तब उसी बेटे ने मुंह मोड़ लिया। बताया जा रहा है कि पिता को घर से निकाल दिया गया और बीच राह छोड़ दिया गया।
पिता की आंखों में आंसू हैं और होंठों पर सिर्फ एक सवाल — "क्या मैंने अपने बेटे को यही संस्कार दिए थे?"
आलीशान जिंदगी, लेकिन रिश्तों में दरार
बताया जाता है कि बेटे आज आर्थिक रूप से सक्षम हैं और अच्छे घरों में रहते हैं। लेकिन जिस पिता ने उनकी नींव रखी, वही आज बेसहारा है। यह घटना बताती है कि आधुनिकता और आर्थिक तरक्की के बीच कहीं न कहीं मानवीय संवेदनाएं खोती जा रही हैं।
समाज और कानून की भूमिका
भारत में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007” (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) लागू है। इस कानून के तहत संतान पर माता-पिता की देखभाल की कानूनी जिम्मेदारी तय की गई है। लेकिन सवाल यह है कि जब रिश्तों में ही संवेदनाएं खत्म हो जाएं, तो सिर्फ कानून कितनी मदद कर सकता है?
क्या नई पीढ़ी संस्कारों से हो रही है दूर?
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज में बढ़ते “जनरेशन गैप” और बुजुर्गों की उपेक्षा की गंभीर तस्वीर पेश करती है।
क्या भौतिक सुख-सुविधाएं रिश्तों से बड़ी हो गई हैं?
क्या माता-पिता अब सिर्फ जिम्मेदारी बनकर रह गए हैं?
क्या संस्कारों का दिवालियापन बढ़ रहा है?
ये सवाल हर परिवार और समाज के लिए सोचने का विषय हैं।
बढ़ती बुजुर्ग उपेक्षा: एक सामाजिक संकट
देशभर में बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, संपत्ति के लालच में त्याग और मानसिक प्रताड़ना के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। रायबरेली की यह घटना हमें याद दिलाती है कि माता-पिता सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
समाज के लिए संदेश
जिस उंगली को पकड़कर हमने चलना सीखा, उसे बुढ़ापे में ठुकराना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन है। जरूरत है कि: परिवारों में संवाद बढ़े, बच्चों को बचपन से संस्कार दिए जाएं, समाज बुजुर्गों के सम्मान को प्राथमिकता दे |
रायबरेली का यह मामला हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है। आधुनिकता के इस दौर में अगर हम अपने माता-पिता को ही भूल जाएं, तो हमारी प्रगति का क्या अर्थ रह जाएगा?



