नाबालिग की इच्छा सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने 7 महीने से अधिक गर्भसमापन की दी अनुमति

Riya Jain
0 सेकंड पहलेHum is cause ke saath hain, awaaz uthani chahiye.
Kabir Shukla
0 सेकंड पहलेYeh sab dekh ke bahut dukh hota hai.
Neel Saxena
0 सेकंड पहलेYeh haalat bahut chintajanak hai, jaldi karyawahi ho.
Ada khan
0 सेकंड पहलेAam janta ka kya hoga? Koi nahi socha inke baare mein.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है, किसी महिला को अवांछित गर्भ ढोने के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे अहम महिला की इच्छा, उसकी गरिमा और उसका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य है, न कि अजन्मे बच्चे के भविष्य की संभावनाएं।
15 वर्षीय नाबालिग को राहत, 30+ हफ्ते का गर्भ समाप्त करने की अनुमति
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने 15 वर्षीय नाबालिग को 30 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी।
अदालत ने माना कि नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुंचा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में देरी या इनकार से नाबालिग अवैध और असुरक्षित गर्भपात केंद्रों की ओर रुख कर सकती है, जो और भी खतरनाक हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा को दी प्राथमिकता
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रही थी, उसकी पढ़ाई प्रभावित हो रही थी और उसने आत्महत्या के प्रयास जैसे संकेत भी दिए थे।
कोर्ट ने टिप्पणी की: “किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना, उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।” यह भी कहा गया कि प्रजनन से जुड़े फैसले महिला की निजी स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा हैं।
अनुच्छेद 21 के तहत मिला संवैधानिक संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें प्रजनन स्वायत्तता भी शामिल है।
अदालत ने कहा कि: महिला का शरीर और उससे जुड़े फैसले उसी के हैं, अनचाही गर्भावस्था को जबरन जारी रखना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, नाबालिगों के मामलों में संवेदनशीलता और प्राथमिकता और अधिक जरूरी है |
AIIMS में सुरक्षित मेडिकल प्रक्रिया का निर्देश
अदालत ने निर्देश दिया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया AIIMS में सुरक्षित और विशेषज्ञ चिकित्सकीय निगरानी में की जाए। साथ ही कोर्ट ने AIIMS की उस पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें गर्भसमापन के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।
सरकार की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि इस स्तर पर गर्भपात से मां और बच्चे दोनों के जीवन को खतरा हो सकता है। हालांकि कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि: केवल आर्थिक सहायता या गोद देने का विकल्प पर्याप्त नहीं, महिला की इच्छा के खिलाफ कोई भी फैसला उचित नहीं |
समाज पर असर: महिलाओं के अधिकार होंगे और मजबूत
इस फैसले से महिलाओं, विशेषकर नाबालिगों के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।
अनचाही गर्भावस्था को ढोने का दबाव कम होगा,
मानसिक तनाव और सामाजिक कलंक में कमी आएगी,
सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की पहुंच बढ़ेगी,
अवैध गर्भपात केंद्रों पर निर्भरता घटेगी,
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों, गरिमा और स्वतंत्रता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह न केवल कानूनी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देता है कि महिला की इच्छा और स्वास्थ्य किसी भी परिस्थिति में सर्वोपरि है।




