मेट्रो या 'कलह' की पटरी: गाली-गलौज और हाथापाई से उठ रहा सवाल
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दिल्ली मेट्रो, जो कभी व्यवस्थित और सुरक्षित यात्रा का प्रतीक माना जाता था, आज लगभग 'अखाड़ा' बन चुकी है। सुबह की भीड़ से लेकर शाम के व्यस्त समय तक, यात्रियों के बीच गाली-गलौज, हाथापाई और झगड़े आम दृश्य बन गए हैं। यह बदलाव केवल यातायात के नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि हमारे समाज और संस्कृति के टूटते मूल्यों का भी संकेत है।
वीडियो में कैद होती असभ्यता
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इसे और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। कई वीडियो में दिख रहा है कि युवा यात्री एक-दूसरे के साथ हिंसक व्यवहार कर रहे हैं, किसी का हाथ पकड़कर या धक्का-मुक्की कर अपनी प्राथमिकता सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। रील बनाने की सनक और 'कौन ज्यादा बड़ा है' की भावना इस असभ्यता को बढ़ा रही है।
यात्रियों का कहना है कि मेट्रो अब एक सार्वजनिक यात्रा का स्थान नहीं रह गया, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे हर कोई अपने लिए लड़ रहा हो। इस प्रकार का व्यवहार न केवल सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय है, बल्कि यह सामाजिक संयम और तमीज़ के टूटने का भी संकेत देता है।
नई पीढ़ी और 'स्व-सीमान्त' सोच
विशेषज्ञों के अनुसार, नई पीढ़ी में स्वयं को सर्वेसर्वा समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। युवा बड़ों का सम्मान करने और संवाद में संयम दिखाने में अक्सर नाकाम रहते हैं। इस रवैये का असर हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक तहजीब पर पड़ रहा है।
एक वरिष्ठ समाजशास्त्री का कहना है, "मेट्रो में रोज़ झगड़ा केवल एक स्थान की समस्या नहीं है, यह समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता और अनुशासनहीनता का प्रतिबिंब है। यदि यही रवैया चलता रहा, तो भविष्य में सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और सहनशीलता की उम्मीद कम हो जाएगी।"
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