मां को घर से निकालने वाले बेटे पर कोर्ट सख्त: कहा- देखभाल नहीं की तो रद्द होगी संपत्ति की गिफ्ट डीड

Kunal Rao
0 सेकंड पहलेSamaj ke liye is khabar ka bahut mahatva hai.
Kabir Shukla
0 सेकंड पहलेYeh haalat bahut chintajanak hai, jaldi karyawahi ho.
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें एक बेटे पर अपनी वृद्ध मां की संपत्ति और धन अपने नाम कराने के बाद उन्हें घर से निकालने का आरोप है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि बेटा अपनी मां की देखभाल नहीं करता और रिश्तों को सुधारने की दिशा में कदम नहीं उठाता, तो उसके पक्ष में हुई संपत्ति की गिफ्ट डीड को रद्द किया जा सकता है।
संपत्ति लेने के बाद मां को छोड़ने का आरोप
मामला तेलंगाना से जुड़ा है, जहां 74 वर्षीय विधवा महिला ने आरोप लगाया कि उनके बेटे ने उनकी संपत्ति अपने नाम कराने के बाद उनसे दूरी बना ली। महिला का कहना है कि बेटे ने न केवल उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर किया, बल्कि उनकी अनुमति के बिना संयुक्त बैंक खाते से लगभग 1.63 करोड़ रुपये भी निकाल लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेटे के आचरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि संपत्ति पर अधिकार हासिल करने के बाद मां को घर छोड़ने के लिए मजबूर करना और उन्हें वापस लाने की इच्छा न दिखाना अत्यंत आपत्तिजनक व्यवहार है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में हाई कोर्ट के निष्कर्ष बेहद स्पष्ट और गंभीर हैं। ऐसे हालात में बेटे की अपील पर नोटिस जारी करना भी कठिन प्रतीत होता है।
हाई कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है गिफ्ट डीड
इससे पहले तेलंगाना हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए बेटे के पक्ष में हुई गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया था और संपत्ति वापस मां के नाम करने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि किसी मां द्वारा अपने बच्चे के लिए किए गए त्याग को मामूली पारिवारिक विवादों के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना था कि संपत्ति और धन हस्तांतरण के तुरंत बाद मां से दूरी बनाना और उनकी उपेक्षा करना बेटे के वास्तविक इरादों को दर्शाता है।
रिश्ते सुधारने के लिए मीडिएशन की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को एक अंतिम अवसर देते हुए मामले को मध्यस्थता (मीडिएशन) के जरिए सुलझाने की सलाह दी है। अदालत ने कहा कि मां-बेटे का संबंध केवल कानूनी विवाद का विषय नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है। पीठ ने बेटे से कहा कि वह अपनी मां के साथ संवाद स्थापित करे, रिश्तों को सुधारने का प्रयास करे और उनकी उचित देखभाल सुनिश्चित करे।
बुजुर्गों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण संदेश
इस मामले को बुजुर्गों के अधिकारों और पारिवारिक जिम्मेदारियों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह संदेश देती है कि माता-पिता की संपत्ति हासिल करने के बाद उनकी उपेक्षा करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि इसके गंभीर कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं। फिलहाल अदालत ने बेटे को सुलह का आखिरी मौका दिया है, लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मां के हितों और अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।






