कर्नाटक में हिजाब, जनेऊ और पगड़ी को मिली अनुमति: कॉलेजों में भगवा शॉल वितरण से फिर छिड़ी नई बहस

कॉलेजों में भगवा शॉल वितरण से फिर छिड़ी नई बहस
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Ada khan

Ada khan

0 सेकंड पहले

Aam janta ka kya hoga? Koi nahi socha inke baare mein.

Sai Mehta

Sai Mehta

0 सेकंड पहले

Yeh sab dekh ke bahut dukh hota hai.

Harsh Pandya

Harsh Pandya

0 सेकंड पहले

Yeh mudda rajneeti se upar hai, insaniyat ki baat hai.

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कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2022 के विवादित यूनिफॉर्म आदेश को रद्द करते हुए स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में छात्रों को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सीमित धार्मिक और पारंपरिक प्रतीक पहनने की अनुमति दे दी है। नए आदेश के तहत हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, शिवधारा, रुद्राक्ष सहित अन्य आस्था-आधारित प्रतीकों को पहनने की छूट होगी, बशर्ते वे संस्थान की यूनिफॉर्म, अनुशासन, सुरक्षा और पहचान व्यवस्था में बाधा न बनें।

 

सरकार के फैसले के बाद परिसरों में बांटी गई भगवा शॉल
सरकार के इस फैसले के बाद कई स्थानों पर हिंदू संगठनों द्वारा छात्रों के बीच भगवा शॉल वितरित किए जाने की खबरें सामने आई हैं। संगठनों का कहना है कि यह सांस्कृतिक पहचान और समान प्रतिनिधित्व का प्रतीक है। वहीं इस कदम ने शैक्षणिक परिसरों में धार्मिक अभिव्यक्ति और ड्रेस कोड को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

 

2022 के हिजाब विवाद की यादें फिर हुईं ताजा
कर्नाटक में वर्ष 2022 में हिजाब विवाद राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा था। उस समय तत्कालीन भाजपा सरकार ने सख्त यूनिफॉर्म नीति लागू की थी, जिसके बाद कई संस्थानों में हिजाब पहनने पर रोक लगाई गई थी। मामला अदालतों तक पहुंचा और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संस्थागत अनुशासन की बहस पूरे देश में छिड़ गई थी। अब कांग्रेस सरकार द्वारा पुराने आदेश को वापस लेने के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।

 

जनेऊ विवाद के बाद तेज हुई नीति समीक्षा
सरकारी सूत्रों के अनुसार, 24 अप्रैल को कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) के दौरान बेंगलुरु के एक कॉलेज में कुछ छात्रों को परीक्षा हॉल में प्रवेश से पहले जनेऊ हटाने के लिए कहे जाने की घटना ने इस विषय पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया। इसके बाद विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समूहों से मिले सुझावों के आधार पर सरकार ने नीति की समीक्षा की और नया आदेश जारी किया।

 

शिक्षा मंत्री ने बताया फैसले का उद्देश्य
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ऐसे स्थान हैं जहां छात्रों को समानता, गरिमा, भाईचारा, अनुशासन, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा भी मिलती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी धर्म का विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों और परंपराओं के प्रति समान सम्मान और निष्पक्ष व्यवहार है।

 

स्कूलों और कॉलेजों को दिए गए विशेष निर्देश
सरकार ने सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि धार्मिक प्रतीकों के आधार पर किसी भी छात्र के साथ भेदभाव न किया जाए। किसी छात्र को केवल धार्मिक पहचान के कारण कक्षा, परीक्षा या अन्य शैक्षणिक गतिविधियों से वंचित नहीं किया जा सकता। साथ ही किसी छात्र को धार्मिक प्रतीक पहनने या हटाने के लिए मजबूर भी नहीं किया जाएगा।

 

राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पुराने नियम रहेंगे लागू
सरकार ने स्पष्ट किया है कि NEET, JEE और अन्य राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सुरक्षा और पहचान से जुड़े ड्रेस कोड नियम पहले की तरह प्रभावी रहेंगे। नया आदेश केवल नियमित शैक्षणिक गतिविधियों और संस्थानों की यूनिफॉर्म नीति से संबंधित है।

 

सोशल मीडिया पर बंटी राय
कर्नाटक सरकार के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की दिशा में सकारात्मक कदम बता रहे हैं, जबकि अन्य का मानना है कि इससे शैक्षणिक परिसरों में एकरूपता और तटस्थता प्रभावित हो सकती है। फिलहाल यह मुद्दा समानता, धार्मिक पहचान और शिक्षा व्यवस्था के संतुलन पर व्यापक राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

कर्नाटक सरकार का नया आदेश शिक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है। हालांकि इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शैक्षणिक संस्थान इस नीति को किस प्रकार लागू करते हैं और इसका छात्रों के वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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Ada khan

Ada khan

0 सेकंड पहले

Aam janta ka kya hoga? Koi nahi socha inke baare mein.

Sai Mehta

Sai Mehta

0 सेकंड पहले

Yeh sab dekh ke bahut dukh hota hai.

Harsh Pandya

Harsh Pandya

0 सेकंड पहले

Yeh mudda rajneeti se upar hai, insaniyat ki baat hai.

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