Supreme Court On Cancer Drug Prices: कैंसर दवाओं की कीमतों पर SC सख्त

Kavya Mishra
4 दिन पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Ada khan
4 दिन पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Rohan Desai
4 दिन पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Neel Saxena
4 दिन पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Pihu Agarwal
4 दिन पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Ananya Sharma
4 दिन पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Dev Kapoor
4 दिन पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Monika Das
4 दिन पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Aryan Malhotra
4 दिन पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Aryan Malhotra
4 दिन पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
सुप्रीम कोर्ट ने आवश्यक कैंसर दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर को लेकर 22 सितंबर 2026 को सुनवाई के दौरान गंभीर चिंता जताई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने बताया गया कि एक आवश्यक कैंसर दवा का प्राइस टू रिटेलर यानी PTR करीब 2,700 रुपये है, जबकि पैकेट पर उसका अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP 27,000 रुपये दर्ज है। यानी रिटेलर कीमत और MRP के बीच करीब दस गुना का अंतर है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं में इतना बड़ा अंतर कैसे स्वीकार किया जा सकता है।
₹2700 से ₹27000 तक कैसे पहुंची कीमत
सुप्रीम कोर्ट के सामने दवा की PTR और MRP के बीच अंतर का यह उदाहरण रखा गया। कोर्ट ने इस पर सवाल करते हुए कहा कि मरीजों पर इलाज का आर्थिक बोझ पहले से ही बहुत ज्यादा है और आवश्यक दवाओं की कीमतों में इतनी बड़ी असमानता गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि, PTR और MRP का एक समान होना जरूरी नहीं है, क्योंकि वितरण श्रृंखला में स्टॉकिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेलर के मार्जिन समेत अन्य लागतें भी शामिल होती हैं। कोर्ट की चिंता खास तौर पर इस उदाहरण में सामने आए दस गुना अंतर के स्तर को लेकर थी।
कीमतों पर नियंत्रण को लेकर सवाल
यह सुनवाई दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाओं और मेडिकल डिवाइस की कीमतों से जुड़े मामलों में हो रही है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई है कि मौजूदा दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था में कई गैर-सूचीबद्ध दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर अलग व्यवस्था है। याचिकाओं में दवाओं की कीमतों पर ज्यादा प्रभावी नियंत्रण और मरीजों को किफायती उपचार उपलब्ध कराने की मांग की गई है। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि सरकार मामले को टकराव के रूप में नहीं देख रही है और मौजूदा व्यवस्था तथा संभावित सुधारों पर अपनी बात रखेगी।
NPPA और सरकार की भूमिका पर भी नजर
देश में निर्धारित आवश्यक दवाओं की कीमतों पर National Pharmaceutical Pricing Authority यानी NPPA की महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार ने मार्च 2026 में बताया था कि 131 एंटी-कैंसर दवाओं पर प्रभावी सीलिंग प्राइस लागू हैं और इससे मरीजों के खर्च में कमी आने का अनुमान है। सरकार के अनुसार इन दवाओं की सीलिंग कीमतें बाजार संबंधी आंकड़ों और निर्धारित नियमों के आधार पर तय की जाती हैं। वहीं गैर-सूचीबद्ध एंटी-कैंसर दवाओं के MRP में पिछले 12 महीनों की कीमत की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी पर भी नियम लागू हैं।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की ऊंची कीमतों का असर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर पड़ने को लेकर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि यदि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत महंगी दवाओं की कीमतों की प्रतिपूर्ति होती है, तो उसका आर्थिक भार सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है। कोर्ट ने दवा मूल्य निर्धारण और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को गंभीर मुद्दा बताया। इस मामले में दवा कंपनियों की ओर से यह भी कहा गया कि खुदरा कीमत और निर्माता के वास्तविक मुनाफे के बीच अंतर हो सकता है तथा पूरे सप्लाई चेन की कीमतों की जांच जरूरी है।
29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 के लिए तय की है। फिलहाल कोर्ट ने कीमतों में इस बड़े अंतर पर सवाल उठाए हैं, लेकिन इस चरण पर किसी विशेष दवा की कीमत घटाने का अंतिम आदेश सामने नहीं आया है। आगे की सुनवाई में केंद्र सरकार और संबंधित पक्ष दवा मूल्य नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था, NPPA की भूमिका और गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमतों से जुड़े मुद्दों पर अपनी दलीलें रख सकते हैं। इसलिए फिलहाल इस मामले को कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और आगे की सुनवाई के रूप में रिपोर्ट करना तथ्यात्मक रूप से सही रहेगा।









