फुटपाथ पर चलना अब मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पैदल यात्रियों को दी सर्वोच्च प्राथमिकता

Anika Rajput
0 सेकंड पहलेAise logon ko support karna humara farz hai.
Ishaan Tiwari
0 सेकंड पहलेYeh haalat bahut chintajanak hai, jaldi karyawahi ho.
देश में पैदल यात्रियों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सीमांकित और सुरक्षित फुटपाथ पर चलना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार सड़कों पर मोटर वाहनों की आवाजाही से अधिक महत्वपूर्ण है और इसे सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से जुड़ा अधिकार
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मिलने वाली आवागमन की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से चलने का अवसर देना सरकार का दायित्व है।
फुटपाथ बनाना और उसका रखरखाव करना अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां सड़क मौजूद है, वहां पैदल यात्रियों के लिए स्पष्ट रूप से चिन्हित और अच्छी तरह से रखरखाव किए गए फुटपाथ भी होने चाहिए। अदालत ने इसे एक "प्रवर्तनीय कानूनी कर्तव्य" बताया। नगर निगम, नगर पालिका, विकास प्राधिकरण और पंचायतों को फुटपाथों के निर्माण, रखरखाव और अतिक्रमण मुक्त रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
5 वर्षीय बच्चे की मौत से जुड़ा मामला
यह फैसला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना मामले की सुनवाई के दौरान आया। एक पिता अपने पांच वर्षीय बेटे को स्कूल ले जा रहा था, तभी पीछे से आए एक टैंकर ने बच्चे को टक्कर मार दी। हादसे में बच्चे की मौत हो गई। जिस स्थान पर दुर्घटना हुई वहां न तो फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था थी।
मुआवजा बढ़ाकर 11.44 लाख रुपये किया गया
सुप्रीम कोर्ट ने मृतक बच्चे के पिता को मिलने वाले मुआवजे को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया। साथ ही उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पहले निर्धारित मुआवजे की राशि को कम कर दिया गया था। अदालत ने दो महीने के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया।
अधिकार के उल्लंघन पर मिलेगा कानूनी संरक्षण
अदालत ने कहा कि यदि किसी नागरिक के सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई कर सकता है। ऐसे मामलों में नागरिक मुआवजा और हर्जाना मांगने के भी हकदार होंगे। यह अधिकार मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले अधिकारों से अलग और स्वतंत्र होगा।
‘पहियों से पहले पैदल चलना अस्तित्व में था’
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शहरी विकास मॉडल पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इंसान पहिए के आविष्कार से बहुत पहले से पैदल चलता आया है, लेकिन आधुनिक शहरी नियोजन में मोटर वाहनों को प्राथमिकता देकर पैदल यात्रियों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। अदालत ने कहा कि सड़क पर सबसे पहला अधिकार पैदल यात्रियों का है और यह अधिकार वाहनों के उपयोग से पहले आता है।
रेगुलेटरी बॉडी बनाने की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि पैदल यात्रियों के मौलिक अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक स्थायी रेगुलेटरी बॉडी का गठन किया जाए। यह संस्था विशेषज्ञों की मदद से डेटा, अनुभव और तकनीकी जानकारी के आधार पर फुटपाथों और पैदल यात्री सुरक्षा से जुड़े मामलों की निगरानी कर सकेगी।
केंद्र सरकार को कानूनी ढांचा तैयार करने का संकेत
अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि फैसले की प्रति केंद्र सरकार, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को भेजी जाए, ताकि पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी ढांचे पर विचार किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में पैदल यात्रियों के अधिकारों को नई संवैधानिक मजबूती देता है। यह निर्णय न केवल सुरक्षित फुटपाथों की आवश्यकता को रेखांकित करता है, बल्कि स्थानीय निकायों और सरकारों को जवाबदेह भी बनाता है। आने वाले समय में यह फैसला देश की शहरी योजना और सड़क सुरक्षा नीतियों में बड़ा बदलाव ला सकता है।






