Vande Mataram Case: Supreme Court Hearing: ‘नक्सली’ टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वंदे मातरम मामले में केंद्र से मांगा जवाब

‘नक्सली’ टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वंदे मातरम मामले में केंद्र से मांगा जवाब
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Pooja Reddy

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Vihaan Patel

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Aditya Verma

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1 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वंदे मातरम से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस हुई। मामला कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है, जिसमें वंदे मातरम के सभी छह अंतरों के गायन से संबंधित केंद्र के निर्देशों और 2026 में किए गए कानूनी संशोधन को चुनौती दी गई है।

 

‘नक्सली’ टिप्पणी पर विवाद
सुनवाई के दौरान मुरलीधर ने संवैधानिक प्रक्रिया और कानून बनाने में व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत पर दलील रखी। इसके जवाब में तुषार मेहता ने संवैधानिक तरीके से निर्णय लेने के संदर्भ में ‘नक्सली’ विचारधारा का उल्लेख किया। मुरलीधर ने इस शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की।

 

मेहता ने टिप्पणी वापस नहीं ली
रिपोर्टों के मुताबिक, तुषार मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और कहा कि उनका संदर्भ किसी व्यक्ति के बजाय ऐसी विचारधारा से था, जिसे वह संवैधानिक प्रक्रिया के विरोध से जोड़ रहे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने इस दौरान कहा कि किसी मुद्दे पर अलग विचार रखना किसी व्यक्ति को ‘नक्सली’ नहीं बनाता।

 

CJI ने बहस सीमित रखने को कहा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहस को मामले के कानूनी सवालों तक सीमित रखने पर जोर दिया। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी सुनवाई के दौरान संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के महत्व पर टिप्पणी की। अदालत ने संकेत दिया कि किसी व्यक्ति के विचार या पहचान से उसके संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होते।

 

वंदे मातरम के गायन पर कानूनी सवाल
टी.एम. कृष्णा की याचिका 2026 के संशोधन और केंद्र के उन निर्देशों को चुनौती देती है, जिनमें कुछ सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के छह अंतरों के गायन का प्रावधान किया गया है। संशोधित कानून में वंदे मातरम के गायन को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में लगे समूह को बाधित करने पर दंड का प्रावधान किया गया है।


 

आपराधिक कार्रवाई के सवाल पर ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह तय करने के बजाय कि वंदे मातरम के कितने अंतरे आधिकारिक रूप से गाए जाएं, इस सवाल पर ध्यान केंद्रित किया कि किसी व्यक्ति को इसे न गाने या गायन में भाग न लेने के लिए आपराधिक कार्रवाई का सामना करना चाहिए या नहीं। अदालत ने इस पहलू को मौलिक अधिकारों और संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में देखने के संकेत दिए।

 

1986 के फैसले का हवाला
सुनवाई के दौरान पीठ ने 1986 के Bijoe Emmanuel फैसले का उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाने वाले छात्रों को दंडित किए जाने के खिलाफ संरक्षण दिया था। मौजूदा मामले में अदालत ने इस पुराने संवैधानिक सिद्धांत की प्रासंगिकता पर विचार किया।

 

केंद्र से दो सप्ताह में जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से टी.एम. कृष्णा की याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है। रिपोर्टों के अनुसार केंद्र को इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। इसके बाद अदालत वंदे मातरम से जुड़े संशोधित कानूनी प्रावधानों और संवैधानिक सवालों पर आगे सुनवाई करेगी।

 

मामले में आगे की सुनवाई
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को लेकर अंतिम फैसला नहीं दिया है। आगे की कार्यवाही में अदालत यह जांच करेगी कि संशोधित दंडात्मक प्रावधान मौलिक अधिकारों और पहले से स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं।

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