RBI Tightens Overseas Investment: विदेश में बड़े निवेश पर RBI की बढ़ी निगरानी

Sneha Menon
13 मिनट पहलेPaise ka khel bahut risk bhara ho gaya hai, sambhal ke chalo.
Vaishali shinde
2 घंटे पहलेPaise ka khel bahut risk bhara ho gaya hai, sambhal ke chalo.
Taushif Shekh
4 घंटे पहलेYeh decision business community ko buri tarah affect karega.
Kunal Rao
4 घंटे पहलेYeh decision business community ko buri tarah affect karega.
Payal jadon
6 घंटे पहलेYeh decision business community ko buri tarah affect karega.
Ananya Sharma
6 घंटे पहलेFinancial planning sochni hogi ab naye sir se.
Monika Das
8 घंटे पहलेBusiness world mein yeh ek badi halachal hai.
विदेश में बड़े निवेश पर RBI ने बढ़ाई निगरानी
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय कंपनियों के बड़े विदेशी निवेश यानी ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) की जांच को अधिक विस्तृत बनाने के लिए बैंकों से अतिरिक्त जानकारी जुटाने को कहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने प्रमुख बैंकों को एक विस्तृत चेकलिस्ट दी है, जिसके तहत उन्हें बड़े विदेशी निवेश सौदों के पीछे का व्यावसायिक तर्क, वित्तीय स्थिति और संभावित जोखिमों की पड़ताल करनी होगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह व्यवस्था एक अरब डॉलर से अधिक के निवेश और उन मामलों पर लागू होगी, जिनमें निवेश निर्धारित नेटवर्थ सीमा से आगे जाता है। इसका उद्देश्य बड़े विदेशी सौदों की उचित जांच और जोखिमों का आकलन करना है।
निवेश पर रोक नहीं, लेकिन जांच होगी सख्त
रिपोर्ट के अनुसार, RBI ने कंपनियों के विदेशी निवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है। हालांकि, अब बैंकों को निवेश के उद्देश्य और सौदे की वित्तीय व्यवहार्यता की अधिक बारीकी से जांच करनी होगी। कंपनियों को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि विदेश में निवेश करना उनके कारोबार के लिए क्यों जरूरी है और इससे उन्हें किस तरह का लाभ मिलने की उम्मीद है। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब रुपये की विनिमय दर और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर आर्थिक क्षेत्र में चर्चा जारी है।
वैल्यूएशन और सौदे की शर्तों की होगी पड़ताल
बैंकों को केवल विदेशी कंपनी की वैल्यूएशन रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय उसके निष्कर्षों की स्वतंत्र जांच करने को कहा गया है। उन्हें यह समझना होगा कि कंपनी की वास्तविक कीमत के मुकाबले कितना प्रीमियम दिया जा रहा है और सौदे की शर्तें उचित हैं या नहीं। यदि निवेश शेयरों की अदला-बदली यानी शेयर स्वैप के जरिए किया जाता है, तो दोनों कंपनियों के मूल्यांकन और एक्सचेंज रेश्यो की जांच भी जरूरी होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय कंपनियां विदेशी संपत्तियों या कारोबार को खरीदते समय जरूरत से ज्यादा कीमत न चुकाएं।
कंपनियों को बताना होगा निवेश का उद्देश्य
नई जांच प्रक्रिया के तहत बैंकों को निवेश करने वाली कंपनी की कमाई, पुराने विदेशी निवेश का अनुभव, मौजूदा देनदारियों और आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता का आकलन करना होगा। कंपनियों से यह भी पूछा जा सकता है कि उन्होंने किसी भारतीय कंपनी के बजाय विदेशी कंपनी में निवेश क्यों चुना। इसके अलावा, विदेशी इकाई वास्तविक कारोबारी गतिविधियां करती है या केवल निवेश रखने वाली होल्डिंग कंपनी है, इसकी जानकारी भी देनी होगी। निवेश से संभावित मुनाफा, निवेश बनाए रखने की अवधि और भविष्य में उससे बाहर निकलने की योजना का विवरण भी महत्वपूर्ण होगा।
देश की अर्थव्यवस्था को होने वाले लाभ का आकलन
बैंकों को विदेशी कंपनी की विश्वसनीयता और उस देश के आर्थिक तथा नियामकीय जोखिमों की जांच भी करनी होगी। बड़े निवेश से भारत को होने वाले संभावित फायदे का विवरण मांगा जा सकता है। इसमें निर्यात बढ़ने, आयात पर निर्भरता कम होने, नए बाजारों तक पहुंच बनाने और नई तकनीक या बौद्धिक संपदा भारत लाने की संभावनाएं शामिल हो सकती हैं। साथ ही, विदेशी इकाई से मिलने वाले डिविडेंड या फीस के रूप में भारत लौटने वाली रकम का अनुमान भी महत्वपूर्ण होगा।
संबंधित पक्षों वाले सौदों पर विशेष ध्यान
यदि किसी विदेशी निवेश में आपस में जुड़ी कंपनियां शामिल हैं या सौदे के जरिए भारत से बाहर धन अथवा आर्थिक मूल्य के अनुचित हस्तांतरण की आशंका है, तो बैंक अतिरिक्त जांच कर सकते हैं। भारतीय कंपनी की ओर से विदेशी इकाई को कर्ज दिलाने के लिए दी गई गारंटी के संभावित जोखिमों का भी आकलन किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में कंपनियों को सौदे की वास्तविक जरूरत, संभावित लाभ और जोखिमों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज देने पड़ सकते हैं। इससे बड़े विदेशी निवेश की जांच में बैंकों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी।
स्पेशल अपडेट
भारतीय कंपनियों के विदेशी निवेश की निगरानी बढ़ाने से बड़े सौदों में पारदर्शिता और जोखिम आकलन पर जोर बढ़ सकता है। हालांकि, निवेश की पात्रता और लागू शर्तों का निर्धारण संबंधित RBI निर्देशों तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के प्रावधानों के अनुसार होगा। कंपनियों और निवेशकों को किसी बड़े विदेशी सौदे से पहले मौजूदा नियमों और बैंक की आवश्यकताओं की पुष्टि करनी चाहिए।







