UP Religious Politics: धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं पर अखिलेश यादव का विरोध, यूपी में सियासत तेज

Anil Sen
0 सेकंड पहलेChunav ke baad sab bhool jaate hain, yahi haqeeqat hai.
यूपी में धार्मिक आयोजनों पर सियासत तेज
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक आयोजनों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की प्रस्तावित कथाओं को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विरोध जताया है। उन्होंने प्रदेश के अलग-अलग जिलों में होने वाले उनके कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने की मांग की है। उनकी आपत्ति भगवान श्रीकृष्ण को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी पर है।
धीरेंद्र शास्त्री इस बयान पर माफी मांग चुके हैं, लेकिन अखिलेश यादव ने उनकी माफी को पर्याप्त नहीं माना। इस विवाद के बीच सवाल उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश में इन कथाओं को लेकर सियासत इतनी तेज क्यों है और इसका बीजेपी तथा सपा की चुनावी रणनीति पर क्या असर पड़ सकता है।
अखिलेश यादव ने कार्यक्रमों पर उठाए सवाल
सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार और प्रशासन से अपील की है कि धीरेंद्र शास्त्री के प्रस्तावित सार्वजनिक आयोजनों को अनुमति न दी जाए। उन्होंने अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़ के कुंडा, गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में होने वाले कार्यक्रमों का उल्लेख किया है।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर कहा था कि धीरेंद्र शास्त्री ने यदुवंशियों और रघुवंशियों, दोनों की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने कहा कि अब उन्हें न ब्रज में प्रवेश मिलेगा और न अवध में। अखिलेश ने उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश सीमा पर ऐसा बोर्ड लगाने की बात भी कही, जिस पर ईशनिंदा करने वालों के प्रवेश पर रोक का संदेश लिखा हो।
इसके बाद उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री के प्रस्तावित कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने और नई अनुमति जारी नहीं करने की मांग की।
श्रीकृष्ण पर टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद
पूरा विवाद मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी से शुरू हुआ। एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते दिखाई दिए। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा और बांसुरी के साथ भगवान राम के सीधे खड़े होने के स्वरूप का जिक्र किया।
इस टिप्पणी पर मथुरा-वृंदावन के कुछ संतों और कृष्ण भक्तों ने आपत्ति जताई। विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य भगवान राम और श्रीकृष्ण में अंतर करना या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने अपनी बात से किसी की भावनाएं आहत होने पर माफी भी मांगी।
हालांकि, अखिलेश यादव ने उनकी माफी को पर्याप्त नहीं माना और इसे ईशनिंदा बताते हुए कार्यक्रम रद्द करने की मांग जारी रखी।
यूपी में कहां-कहां प्रस्तावित हैं कथाएं
धीरेंद्र शास्त्री के अगले कुछ कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में प्रस्तावित हैं। इनमें कई आयोजन स्थानीय राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों से जुड़े बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि इन कथाओं को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।
प्रतापगढ़ के कुंडा में कथा
17 से 19 नवंबर 2026 तक तीन दिवसीय श्री हनुमंत कथा का आयोजन प्रस्तावित है। इसका आयोजन जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के अध्यक्ष और कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की ओर से कराया जा रहा है।
गोंडा में प्रस्तावित कार्यक्रम
4 से 6 दिसंबर 2026 तक गोंडा में कथा का कार्यक्रम प्रस्तावित है। इस आयोजन को कटरा विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक बावन सिंह से जोड़ा जा रहा है।
झांसी में हनुमंत कथा
11 से 13 दिसंबर 2026 तक झांसी में धीरेंद्र शास्त्री की हनुमंत कथा प्रस्तावित है। झांसी के बीजेपी विधायक रवि शर्मा ने इस आयोजन की जानकारी दी थी। इससे पहले 4 से 10 दिसंबर तक शहर में पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथा भी प्रस्तावित है।
लखनऊ और आगरा में आयोजन
लखनऊ में 17 से 21 दिसंबर 2026 तक और आगरा में 23 से 25 दिसंबर 2026 तक कथा के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
इन आयोजनों के अलावा जौनपुर में पूर्व सांसद धनंजय सिंह की ओर से जया किशोरी की कथा और महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री तथा बीजेपी नेता कृपाशंकर सिंह की ओर से कुमार विश्वास का कार्यक्रम कराने की चर्चाएं भी हैं।
सपा को किस बात का डर
धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को लेकर अखिलेश यादव की आपत्ति के पीछे विवादित टिप्पणी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति भी अहम पहलू है। सपा की राजनीति में पिछड़ा वर्ग, खासकर यादव समुदाय महत्वपूर्ण आधार रहा है। भगवान श्रीकृष्ण को यादव समाज अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जोड़ता है। ऐसे में श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर अखिलेश यादव का खुलकर विरोध करना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दूसरी ओर, सपा की कोशिश रही है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जातीय समीकरणों, सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों और पीडीए जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रहे। पार्टी के सामने चुनौती है कि चुनावी बहस धार्मिक पहचान और ध्रुवीकरण की ओर न खिसक जाए। सपा को आशंका है कि धार्मिक कथाओं और बड़े आयोजनों के जरिए चुनाव से पहले ऐसा माहौल बन सकता है, जिसमें जाति और सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल पीछे छूट जाएं।
बीजेपी के सामने क्या चुनौती
धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को लेकर बीजेपी के सामने भी राजनीतिक चुनौती है। उत्तर प्रदेश में कई प्रस्तावित कथाओं के आयोजन स्थानीय बीजेपी विधायकों या नेताओं से जुड़े बताए जा रहे हैं। ऐसे में पार्टी के सामने सवाल है कि धार्मिक आयोजनों को लेकर उसका रुख क्या होगा और यदि किसी कार्यक्रम में फिर कोई विवादित टिप्पणी होती है तो उसका राजनीतिक असर कैसे संभाला जाएगा।
धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। इन कार्यक्रमों में स्थानीय नेताओं की मौजूदगी और आयोजन से उनका जुड़ाव भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनता है। यदि मंच से कोई ऐसा बयान आता है, जिस पर नया विवाद खड़ा हो जाए, तो विपक्ष को सरकार और बीजेपी पर सवाल उठाने का मौका मिल सकता है। दूसरी ओर, बीजेपी के लिए अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देना और धार्मिक मुद्दों पर अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट रखना भी जरूरी है।
बीजेपी प्रवक्ता ने अखिलेश यादव पर उठाए सवाल
इस विवाद पर बीजेपी की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। बीजेपी प्रवक्ता हीरो वाजपेयी ने अखिलेश यादव पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव नजदीक आने पर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण याद आ रहे हैं। उन्होंने अखिलेश यादव से कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा।
इस तरह बीजेपी इस विवाद को केवल धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी तक सीमित रखने के बजाय अखिलेश यादव की धार्मिक और राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में भी देख रही है।
चुनावी माहौल में बढ़ सकती है बहस
धीरेंद्र शास्त्री की प्रस्तावित कथाओं और अखिलेश यादव के विरोध ने उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। एक ओर सपा को चुनावी मुद्दों के धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर जाने की आशंका है, वहीं बीजेपी के सामने आयोजनों से जुड़े विवादों और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की चुनौती है। आने वाले दिनों में इन कार्यक्रमों को लेकर प्रशासनिक फैसले और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस बहस की दिशा तय कर सकती हैं।








