स्कूलों में वीडियोग्राफी बैन पर सवाल: सुप्रीम कोर्ट पहुंचा स्कूलों का मामला

Dhruv Bhatt
0 सेकंड पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Kavya Mishra
0 सेकंड पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Arjun Singh
0 सेकंड पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Ishaan Tiwari
56 मिनट पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Vaishali shinde
1 घंटे पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Aditya Verma
1 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Simran Arora
4 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Ritika Ghosh
4 घंटे पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Ananya Sharma
5 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर लगाए गए प्रतिबंध को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के वकील नरेंद्र मिश्रा की ओर से जनहित याचिका दाखिल कर दोनों राज्यों के संबंधित सर्कुलर को रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में पत्रकारों, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सिविल सोसाइटी प्रतिनिधियों की स्कूलों में एंट्री पर लगाए गए प्रतिबंधों का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने इसे कई संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मामला बताया है। याचिका में अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A का हवाला दिया गया है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर रहेगी।
क्या है सरकारी आदेश का विवाद
राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इन नियमों के तहत पत्रकारों, यूट्यूबर्स और अन्य बाहरी व्यक्तियों को स्कूल परिसर में प्रवेश से पहले अनुमति लेने की आवश्यकता होगी। बिना अनुमति फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग पर भी रोक लगाई गई है। सरकारों की ओर से ऐसे नियमों के पीछे विद्यार्थियों की सुरक्षा और निजता की रक्षा का तर्क दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि स्कूलों में अनधिकृत रिकॉर्डिंग से बच्चों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। इसी व्यवस्था को लेकर अब कानूनी चुनौती सामने आई है।
याचिका में संवैधानिक अधिकारों का हवाला
याचिका में सरकारी आदेशों को संविधान में मिले मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकारी संस्थानों की स्थिति और वहां उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी सामने लाना सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय है। इसके साथ ही पत्रकारों और नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार का भी सवाल उठाया गया है। याचिका में अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा अनुच्छेद 21 और 21-A के तहत जीवन और शिक्षा से जुड़े अधिकारों को भी आधार बनाया गया है। अब अदालत को सुरक्षा और निजता के साथ पारदर्शिता के अधिकार के बीच संतुलन पर विचार करना होगा।
राजस्थान में स्कूल ठीक करो अभियान के बाद विवाद
राजस्थान में यह विवाद उस समय ज्यादा चर्चा में आया जब CJP और कुछ सामाजिक संगठनों ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर स्कूल ठीक करो अभियान शुरू किया। अभियान के तहत स्कूलों की इमारतों और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए गए। इसके बाद शिक्षा विभाग ने स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। सरकार ने अपने कदम के पीछे बच्चों की निजता और सुरक्षा को प्रमुख कारण बताया। दूसरी ओर अभियान से जुड़े लोगों ने इसे सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आने से रोकने वाला कदम बताया। इसी विवाद ने अब कानूनी रूप ले लिया है।
प्राइवेसी और पारदर्शिता आमने सामने
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल बच्चों की निजता और सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता के बीच संतुलन का है। एक तरफ स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की तस्वीरों और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा जरूरी है। दूसरी तरफ सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान हैं और वहां की व्यवस्थाओं को लेकर जनता में पारदर्शिता की मांग भी रहती है। याचिका में इसी संतुलन को लेकर अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है। यदि स्कूलों में मीडिया या नागरिकों की पहुंच पूरी तरह सीमित होती है तो सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति सामने लाने को लेकर सवाल उठ सकते हैं। वहीं बिना नियमों के रिकॉर्डिंग से बच्चों और शिक्षकों की निजता प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी नजर
उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों से जुड़ा यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंच चुका है। याचिकाकर्ता ने संबंधित सरकारी सर्कुलर को रद्द करने की मांग की है और कई संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है। मामले में अदालत का रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों और मीडिया की पहुंच को किस सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही बच्चों की निजता और सुरक्षा के लिए किन शर्तों के साथ रिपोर्टिंग या रिकॉर्डिंग की अनुमति दी जा सकती है, यह भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। इस मामले के फैसले का असर दूसरे राज्यों में भी स्कूलों की मीडिया कवरेज और निरीक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है ।




