2029 में एक साथ चुनाव की तैयारी: वन नेशन वन इलेक्शन की तैयारी

Nidhi kumari
7 घंटे पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Anil Sen
8 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Sonu rai
8 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Reyansh Joshi
10 घंटे पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Riya Jain
12 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Neha Tripathi
13 घंटे पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Aryan Malhotra
13 घंटे पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
देश में 'एक देश, एक चुनाव' यानी One Nation, One Election को लेकर केंद्र की एनडीए सरकार की तैयारियों की चर्चा तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार 2034 का इंतजार करने के बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ ही कई राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रही है। प्रस्तावित योजना के तहत एनडीए शासित या सहयोगी दलों की सरकार वाले करीब 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराए जाने की संभावना पर मंथन किया जा रहा है। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कुछ राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही चुनाव कराने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, यह अभी रिपोर्ट्स में सामने आया एक संभावित राजनीतिक और चुनावी खाका है और इसे अंतिम सरकारी फैसला नहीं माना जा सकता। सरकार के सामने इसे लागू करने के लिए संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक प्रक्रियाओं को पूरा करने की बड़ी चुनौती होगी।
22 राज्यों को लेकर सामने आया संभावित खाका
रिपोर्ट्स के मुताबिक 2029 में एक साथ चुनाव कराने की संभावित योजना के पहले चरण में उन राज्यों को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है जहां एनडीए या उसके सहयोगी दलों की सरकार है। इसका उद्देश्य अलग-अलग समय पर होने वाले विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर चुनावी चक्र को धीरे-धीरे एक समान करना बताया जा रहा है। कुछ राज्यों में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 2029 से आगे तक जा सकता है, इसलिए वहां समय से पहले विधानसभा भंग करने या चुनावी समय-सारणी में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी तरह कुछ राज्यों के चुनावी चक्र को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार समायोजित करना होगा। इस पूरी प्रक्रिया में संसद, केंद्र सरकार और चुनावी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इसलिए 2029 में एक साथ चुनाव कराने की संभावित योजना को लेकर अभी से राजनीतिक और कानूनी स्तर पर चर्चा तेज होने की संभावना है।
'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे में जनता का रुख
'एक देश, एक चुनाव' की चर्चा के बीच 'मूड ऑफ द नेशन' यानी MOTN सर्वे के आंकड़े भी सामने आए हैं। सर्वे के अनुसार देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की अवधारणा को अभी भी बहुमत से अधिक लोगों का समर्थन प्राप्त है। जनवरी 2026 में जहां 74 प्रतिशत लोगों ने इस व्यवस्था के समर्थन में राय दी थी, वहीं अगस्त 2026 में यह आंकड़ा घटकर 70.4 प्रतिशत रह गया। यानी समर्थन में कुछ कमी जरूर आई है, लेकिन अभी भी 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग इस विचार के पक्ष में बताए गए हैं। सर्वे के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि चुनाव सुधार और बार-बार होने वाले चुनावों को लेकर जनता के बीच चर्चा बनी हुई है। हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय सर्वे के नमूने, पद्धति और सर्वेक्षण की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
समर्थन के बावजूद संघीय ढांचे पर सवाल
एक साथ चुनाव कराने के विचार को लेकर जहां बड़ी संख्या में लोग समर्थन जता रहे हैं, वहीं राजनीतिक दलों के बीच इसे लेकर मतभेद भी हैं। क्षेत्रीय दलों की ओर से राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने से राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव राज्य के स्थानीय मुद्दों पर पड़ सकता है। वहीं समर्थकों का कहना है कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी मशीनरी और राजनीतिक दलों पर लगातार चुनावी दबाव बना रहता है। उनका मानना है कि एक साथ चुनाव होने से चुनावी खर्च और प्रशासनिक संसाधनों के इस्तेमाल में कमी लाई जा सकती है। इसी वजह से 'एक देश, एक चुनाव' को लेकर राजनीतिक बहस आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।
सरकार के सामने संवैधानिक और कानूनी चुनौती
'एक देश, एक चुनाव' को पूरी तरह लागू करना केवल राजनीतिक निर्णय से संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिए व्यापक संवैधानिक और कानूनी बदलावों की आवश्यकता पड़ सकती है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़े प्रावधानों में बदलाव करने के साथ चुनावों के समय को एक साथ लाने की व्यवस्था तैयार करनी होगी। कुछ मामलों में राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल सामान्य अवधि से पहले समाप्त करने का सवाल भी सामने आ सकता है। ऐसे बदलावों के लिए संसद में आवश्यक विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राज्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। विपक्षी दल इस प्रस्ताव को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहे हैं और इसे लोकतांत्रिक विविधता तथा राज्यों के अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाते हैं। इसलिए 2029 में प्रस्तावित किसी भी मॉडल को लागू करने से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति हासिल करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।
2029 के खाके पर आगे बढ़ेगी राजनीतिक बहस
2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने की संभावित योजना ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार चुनावी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने और बार-बार होने वाले चुनावों से जुड़े खर्च को कम करने के तर्क के साथ आगे बढ़ सकती है। दूसरी तरफ विपक्षी दल राज्यों के अधिकार, राजनीतिक विविधता और स्थानीय मुद्दों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठा सकते हैं। 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे में 70.4 प्रतिशत समर्थन का आंकड़ा इस मुद्दे पर जनता की राय का एक महत्वपूर्ण संकेत है, हालांकि जनवरी के मुकाबले समर्थन में कमी भी दर्ज हुई है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2029 तक इस प्रस्ताव को किस कानूनी और संवैधानिक मॉडल के तहत लागू किया जा सकता है। आने वाले समय में संसद, राजनीतिक दलों और चुनावी संस्थाओं के बीच इस मुद्दे पर चर्चा और तेज होने की संभावना है।







