सुप्रीम कोर्ट में हंगामा, जजों पर फेंके कागज: कोर्ट रूम से बाहर निकाला गया याचिकाकर्ता

कोर्ट रूम से बाहर निकाला गया याचिकाकर्ता
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Harsh Pandya

Harsh Pandya

0 सेकंड पहले

Bharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने के लिए प्रबल प्रताप नामक याचिकाकर्ता स्वयं (इन-पर्सन) सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई शुरू होते ही उसने अदालत से लखनऊ के एक एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने की मांग की। पीठ ने जब उसे कानूनी प्रक्रिया समझाने की कोशिश की, तब उसने न्यायालय की कार्यवाही के दौरान असामान्य व्यवहार करना शुरू कर दिया।


कोर्ट रूम में कैसे हुआ हंगामा?
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने जब याचिकाकर्ता के लहजे पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तो माहौल तनावपूर्ण हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी फाइल से कागज निकालकर हवा में उछाल दिए और कथित रूप से CJI के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। उसने न्यायाधीशों को "आदरणीय" कहने के बजाय "न्यायिक सेवक" कहकर संबोधित किया, जिससे कोर्ट रूम में कुछ समय के लिए व्यवधान उत्पन्न हुआ।


सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा
घटना के दौरान कोर्ट में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया और याचिकाकर्ता को कोर्ट रूम से बाहर ले गए। इसके बाद दिल्ली पुलिस उसे पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई। घटना के बावजूद पीठ ने संयम बनाए रखा और अन्य मामलों की सुनवाई सामान्य रूप से जारी रखी।

 

 याचिका क्यों दायर की गई थी?
प्रबल प्रताप ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल 2026 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी। वह एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट में भी उसकी याचिका पर कानूनी आधार पर विचार किया गया, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया।


सुप्रीम कोर्ट का फैसला और टिप्पणी
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर जारी आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने मामले के गुण-दोष पर बहस करने के बजाय असंगत और असंसदीय भाषा का प्रयोग किया। अदालत ने यह भी कहा कि उसकी मानसिक स्थिति और हताशा को देखते हुए उसके खिलाफ तत्काल अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई नहीं की जा रही है। साथ ही, अदालत ने उसकी याचिका को कानूनी आधार पर खारिज कर दिया।


संतुलित दृष्टिकोण
यह घटना न्यायालय की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया के पालन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। अदालत ने एक ओर कोर्ट रूम में अनुशासन बनाए रखने का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ता की परिस्थितियों को देखते हुए दंडात्मक कार्रवाई से परहेज कर संयमित रुख अपनाया। मामले में आगे यदि कोई कानूनी कार्रवाई होती है, तो वह संबंधित एजेंसियों और न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार होगी।

 

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