आदिवासी छात्रों का पुणे में आंदोलन: रोहित पवार ने छात्रों का समर्थन किया

रोहित पवार ने छात्रों का समर्थन किया
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Diya Gupta

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0 सेकंड पहले

Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

Riya Jain

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0 सेकंड पहले

Hamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.

Reyansh Joshi

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0 सेकंड पहले

Desh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.

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महाराष्ट्र में आदिवासी विकास विभाग द्वारा संचालित सरकारी छात्रावासों के नए नियमों को लेकर आदिवासी छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। छात्र पुणे के मांजरी और जेएम रोड पर भूख हड़ताल और मार्च के जरिए अपनी मांगें सरकार तक पहुंचा रहे हैं। आंदोलनकारी छात्र 5 अगस्त को जारी सरकारी प्रस्ताव यानी GR में किए गए बदलावों का विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि नए नियमों से दूरदराज के इलाकों से शहरों में पढ़ाई करने आने वाले आदिवासी विद्यार्थियों को परेशानी होगी। प्रदर्शनकारी छात्रों ने सरकार से पुराने नियमों को बहाल करने की मांग की है। आंदोलन के बीच एनसीपी शरदचंद्र पवार गुट के विधायक रोहित पवार भी छात्रों के समर्थन में आंदोलन स्थल पर पहुंचे।


70 प्रतिशत स्थानीय कोटा का विरोध
आदिवासी छात्रों के विरोध का एक प्रमुख कारण सरकारी छात्रावासों में 70 प्रतिशत स्थानीय छात्रों के लिए अनिवार्य शर्त बताई जा रही है। छात्रों का कहना है कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, विदर्भ और खानदेश जैसे दूरदराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी पुणे, मुंबई और नासिक जैसे शहरों में उच्च शिक्षा के लिए आते हैं। ऐसे में स्थानीयता की शर्त से दूसरे जिलों के जरूरतमंद छात्रों के लिए हॉस्टल में प्रवेश मुश्किल हो सकता है। आंदोलनकारी छात्रों ने सरकार से इस प्रावधान पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी छात्रावासों का उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक रूप से जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। इसलिए नियम बनाते समय दूरदराज के आदिवासी विद्यार्थियों की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।


आयु सीमा के नियम पर भी नाराजगी
छात्रावासों में रहने के लिए निर्धारित आयु सीमा को लेकर भी छात्रों में नाराजगी है। आंदोलनकारी छात्रों के अनुसार पहले 26 वर्ष और बाद में 30 वर्ष की आयु सीमा से जुड़े नियम सामने आए हैं। छात्रों का कहना है कि उच्च शिक्षा पूरी करने में कई विद्यार्थियों को अलग-अलग कारणों से अधिक समय लग जाता है। ऐसे में आयु सीमा के कारण जरूरतमंद विद्यार्थियों को सरकारी छात्रावास की सुविधा से बाहर किया जा सकता है। छात्रों ने सरकार से इस प्रावधान को भी वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि शिक्षा जारी रखने वाले विद्यार्थियों को केवल उम्र के आधार पर छात्रावास की सुविधा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर आंदोलनकारी छात्र लगातार सरकार के सामने अपनी मांगें रख रहे हैं।

 

प्रदर्शन में भाग लेने पर रोक का विरोध
आंदोलनकारी छात्रों ने हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के प्रदर्शन और संगठनों से जुड़ने पर कथित रोक का भी विरोध किया है। छात्रों का कहना है कि नए नियमों में छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के किसी संगठन या विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने को लेकर प्रतिबंध लगाया गया है। छात्रों ने इसे अपने अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। उनका कहना है कि अपनी समस्याओं और मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से उठाना विद्यार्थियों के लिए जरूरी है। इसी वजह से इस प्रावधान को लेकर आंदोलन और तेज हुआ है। छात्रों ने सरकार से मांग की है कि छात्रावास नियमों में ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए जो उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित करें।


रोहित पवार ने आंदोलन को दिया समर्थन
एनसीपी शरदचंद्र पवार गुट के विधायक रोहित पवार आंदोलन स्थल पर पहुंचे और आदिवासी छात्रों से मुलाकात की। उन्होंने छात्रों की समस्याएं सुनीं और उनके मार्च में शामिल होकर आंदोलन को अपना समर्थन दिया। रोहित पवार ने कहा कि छात्रों को अपनी मांगों और अधिकारों के लिए आवाज उठाने से रोकना उचित नहीं है। उन्होंने सरकार से छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की। रोहित पवार ने आरोप लगाया कि नए नियमों से राज्य के अलग-अलग जिलों से आने वाले आदिवासी विद्यार्थियों को परेशानी हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने छात्रों की मांगों का जल्द समाधान नहीं किया तो आंदोलन को और व्यापक किया जा सकता है।


दो दिन में समाधान की चेतावनी
रोहित पवार ने सरकार से आदिवासी छात्रों की मांगों पर तत्काल बातचीत करने और समाधान निकालने की अपील की है। उन्होंने कहा कि पूरे महाराष्ट्र में आदिवासी छात्र पुराने हॉस्टल नियमों को बहाल करने की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारी छात्रों ने भी स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर सरकार सकारात्मक फैसला नहीं लेती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। पुणे में भूख हड़ताल और मार्च के कारण यह मुद्दा अब राजनीतिक रूप भी ले चुका है। सरकार की ओर से नियमों में बदलाव और छात्रों की आपत्तियों पर आगे क्या फैसला लिया जाता है, इस पर सभी की नजर है। फिलहाल आदिवासी छात्रों का आंदोलन पुणे में लगातार जारी है और आने वाले दिनों में इसके और व्यापक होने की संभावना बनी हुई है।

 

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