NCERT textbook case: NCERT विवाद पर SC का फैसला

Reyansh Joshi
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Ritika Ghosh
0 सेकंड पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Sai Mehta
0 सेकंड पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की NCERT सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े विवादित अध्याय पर स्वतः संज्ञान की कार्यवाही बंद कर दी है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि न्यायपालिका आलोचना से परहेज नहीं करती और निष्पक्ष, तथ्यपरक तथा रचनात्मक आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था में जरूरी है। हालांकि ऐसी गंभीर बातें, जिनकी पुष्टि न हुई हो, उन्हें बिना सत्यापन के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना उचित नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब विवादित अध्याय को विशेषज्ञ पैनल की सिफारिशों के आधार पर बदले जाने की जानकारी दी गई।
क्या था NCERT की किताब का विवाद
विवाद NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक Exploring Society: India and Beyond, Part II के अध्याय 4 ‘The Role of the Judiciary in our Society’ में शामिल ‘Corruption in the Judiciary’ शीर्षक वाले हिस्से को लेकर शुरू हुआ था। फरवरी 2026 में मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और विवादित सामग्री के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण तथा डिजिटल प्रसार पर रोक लगा दी थी। अदालत ने उस समय सामग्री को न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली बताते हुए गंभीर आपत्ति जताई थी।
आलोचना जरूरी, लेकिन तथ्यपरक हो
मामले को बंद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना और बिना पुष्टि किए गए दावों के बीच स्पष्ट अंतर बताया। पीठ के मुताबिक न्यायपालिका की निष्पक्ष, सूचनापरक और रचनात्मक समीक्षा संस्थागत जवाबदेही तथा आत्म-सुधार के लिए जरूरी है। लेकिन ऐसी आलोचना उचित मंच और तार्किक तरीके से होनी चाहिए तथा बिना सत्यापन के उसे ऐसे स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए, जो बच्चों के लिए तैयार किया गया हो। कोर्ट ने इसे ‘जिम्मेदार विमर्श’ और ‘बिना पुष्टि के दावे’ के बीच का अंतर बताया।
NCERT ने मांगी थी बिना शर्त माफी
विवाद सामने आने के बाद NCERT के निदेशक ने अदालत के समक्ष विवादित सामग्री को लेकर बिना शर्त और बिना योग्यता वाली माफी पेश की थी। NCERT ने विवादित पुस्तक को वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू की थी। इसके बाद केंद्र की ओर से गठित विशेषज्ञ पैनल ने पाठ्य सामग्री की समीक्षा की और विवादित अध्याय में बदलाव किए गए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इन संशोधनों को संज्ञान में लेते हुए माना कि मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता अब नहीं रह गई है।
तीन शिक्षाविदों को लेकर भी कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की
मामले में पाठ्य सामग्री तैयार करने से जुड़े तीन शिक्षाविदों प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार का नाम भी सामने आया था। मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने उनके संबंध में कड़ा रुख अपनाया था, लेकिन बाद की सुनवाई में उनके स्पष्टीकरण पर विचार करते हुए अदालत ने अपने पहले के आदेश के संबंधित हिस्से को वापस लिया और स्पष्ट किया कि पाठ्य सामग्री तैयार करना सामूहिक प्रक्रिया थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां सामग्री के संदर्भ में थीं, किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम व्यक्तिगत निष्कर्ष के रूप में नहीं।
विवादित अध्याय बदला गया, सुप्रीम कोर्ट ने केस बंद किया
केंद्र द्वारा गठित विशेषज्ञ पैनल की सिफारिशों के बाद विवादित अध्याय को संशोधित कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर के आदेश में कहा कि अब विवादित सामग्री को बदला जा चुका है और इसलिए स्वतः संज्ञान की कार्यवाही जारी रखने की जरूरत नहीं है। अदालत का अंतिम संदेश यह रहा कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन स्कूली पाठ्यक्रम में गंभीर आरोप या दावे शामिल करते समय तथ्यात्मक पुष्टि और जिम्मेदार विमर्श जरूरी है।





