Delhi HC Child Custody Ruling: मां के रहते दादा को नहीं मिलेगी बच्चों की कस्टडी

Neel Saxena
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Kavya Mishra
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Neel Saxena
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
मां के रहते दादा को नहीं मिलेगी पोते-पोतियों की कस्टडी
दिल्ली हाई कोर्ट ने पोते-पोतियों की कस्टडी मांगने वाले दादा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मां को अयोग्य या लापरवाह साबित किए बिना उसके अभिभावकीय अधिकार नहीं छीने जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल नौकरी करने के आधार पर किसी मां को बच्चों की परवरिश के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जा सकता।
वर्किंग मदर के अधिकार पर अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने कहा कि संबंधित महिला आयकर अधिकारी हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के साथ अपनी जिम्मेदारियां भी निभा रही हैं। अदालत के अनुसार, मां की स्वाभाविक अभिभावकता को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता। बच्चों के हित और उनकी देखभाल से जुड़े तथ्यों को ध्यान में रखकर ही कस्टडी पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
बच्चों के पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ रह रहे हैं बच्चे
अदालत ने यह टिप्पणी पारिवारिक अदालत के 15 मई 2026 के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए की। पारिवारिक अदालत ने शांतनु ग्रोवर और उनकी बहन मन्नत ग्रोवर की कस्टडी दादा को देने से इनकार कर दिया था। बच्चों के पिता का दिसंबर 2016 में निधन हो गया था। इसके बाद से दोनों बच्चे अपनी मां के साथ रह रहे हैं।
दादा ने उठाया था बच्चों की परवरिश का मुद्दा
दादा ने अपनी अपील में तर्क दिया था कि बच्चों की मां एक वर्किंग प्रोफेशनल हैं और उनके पास बच्चों की परवरिश के लिए पर्याप्त समय नहीं है। उन्होंने बच्चों को बेहतर माहौल उपलब्ध कराने से जुड़ी चिंताएं भी जताईं। हालांकि, अदालत ने कहा कि मां को अयोग्य ठहराने के लिए ठोस आधार जरूरी हैं और केवल नौकरी करना उसके खिलाफ फैसला लेने का पर्याप्त कारण नहीं है।
बच्चों की इच्छा को भी दिया गया महत्व
अदालत ने रिकॉर्ड में पाया कि दोनों बच्चों की उम्र लगभग 17 और 14 वर्ष है और उन्होंने पारिवारिक अदालत के समक्ष स्वतंत्र रूप से अपनी मां के साथ रहने की इच्छा जताई थी। पीठ को ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि बच्चों को इस संबंध में सिखाया या पढ़ाया गया हो। अदालत ने 2016 से पहले के वैवाहिक विवाद और क्रूरता के आरोपों को भी मौजूदा कस्टडी विवाद के संदर्भ में अप्रासंगिक माना।
दादा-दादी से मिलने के लिए बाध्य नहीं होगी बालिग पोती
पीठ ने कहा कि बड़ी पोती बालिग है, इसलिए उसे दादा-दादी से मिलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि, दादा चाहें तो पारिवारिक अदालत में मिलने के अधिकार के लिए अलग आवेदन दायर कर सकते हैं। इस पर निर्णय लेते समय बच्चों की इच्छा को महत्व दिया जाएगा।








