Rath Vanaspati Ghee ,Dalda Brand History: डालडा को टक्कर देने आया था रथ वनस्पति घी, 76 साल पुराना है इसका दिलचस्प इतिहास

Harsh Pandya
4 घंटे पहलेYeh kahani kisi thriller movie se bilkul kam nahi.
Ada khan
4 घंटे पहलेSach saamne aana chahiye, chahe kitna waqt lage.
Yash Kulkarni
4 घंटे पहलेIs rahasya ki tah mein kya chhupa hai, sochne par majboor kar diya.
Kunal Rao
5 घंटे पहलेYeh kahani kisi thriller movie se bilkul kam nahi.
Ishaan Tiwari
5 घंटे पहलेItne saalon baad bhi sach kyon nahi aaya saamne?
Simran Arora
6 घंटे पहलेYeh kahani kisi thriller movie se bilkul kam nahi.
Myra Dubey
6 घंटे पहलेSach saamne aana chahiye, chahe kitna waqt lage.
Pihu Agarwal
6 घंटे पहलेYeh case bahut gehri saazish lagti hai.
Vaishali shinde
7 घंटे पहलेSach saamne aana chahiye, chahe kitna waqt lage.
Dev Kapoor
7 घंटे पहलेItne saalon baad bhi sach kyon nahi aaya saamne?
Monika Das
8 घंटे पहलेAur gehri jaanch honi chahiye is poore matter mein.
Neel Saxena
8 घंटे पहलेSach saamne aana chahiye, chahe kitna waqt lage.
Aarohi Chaudhary
9 घंटे पहलेYeh kahani kisi thriller movie se bilkul kam nahi.
Anil Sen
9 घंटे पहलेSach saamne aana chahiye, chahe kitna waqt lage.
Harsh Pandya
9 घंटे पहलेAur gehri jaanch honi chahiye is poore matter mein.
Taushif Shekh
10 घंटे पहलेYeh case bahut gehri saazish lagti hai.
Vivaan Gupta
11 घंटे पहलेYeh case bahut gehri saazish lagti hai.
Kavya Mishra
11 घंटे पहलेInvestigation mein koi loophole zaroor hai.
भारत में कुछ ब्रांड ऐसे रहे हैं, जिनका नाम सुनते ही पुराने दिनों की यादें ताजा हो जाती हैं। घरों में बनने वाले पकवान, त्योहारों की मिठाइयां और टीवी पर आने वाले पुराने विज्ञापन इन ब्रांडों की पहचान का हिस्सा रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है रथ वनस्पति घी (Rath Vanaspati Ghee)। एक समय यह ब्रांड भारतीय रसोई में काफी जाना-पहचाना था। इसकी शुरुआत वर्ष 1950 में हुई थी। उस दौर में बाजार में डालडा का दबदबा था और रथ वनस्पति घी को इसी स्थापित ब्रांड को चुनौती देने के उद्देश्य से पेश किया गया था। करीब 76 साल का सफर तय कर चुके इस ब्रांड की कहानी कारोबार, विज्ञापन और बदलती उपभोक्ता पसंद से जुड़ी हुई है।
डालडा के दबदबे के बीच कैसे हुई रथ की शुरुआत?
रथ वनस्पति घी को वर्ष 1950 में डीसीएम समूह ने बाजार में उतारा था। उस समय डालडा वनस्पति घी भारतीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना चुका था। डालडा की शुरुआत वर्ष 1937 में हुई थी और धीरे-धीरे यह कई घरों में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख ब्रांड बन गया था।
ऐसे माहौल में रथ वनस्पति घी की शुरुआत एक बड़ी कारोबारी चुनौती थी। कंपनी का उद्देश्य घरेलू उपभोक्ताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाना और बाजार में पहले से मौजूद ब्रांड को टक्कर देना था।
डीसीएम समूह का पनघट नाम से एक अन्य वनस्पति घी ब्रांड भी था। हालांकि, पनघट मुख्य रूप से हलवाइयों, होटलों, रेस्तरां और थोक बाजार को ध्यान में रखकर बेचा जाता था। इसके बड़े पैक कारोबारियों की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाते थे। दूसरी ओर, रथ वनस्पति घी को आम परिवारों और घरेलू रसोई तक पहुंचाने पर ध्यान दिया गया।
विज्ञापनों में उत्पाद से ज्यादा परिवार पर दिया जोर
रथ वनस्पति घी की पहचान बनाने में उसके विज्ञापनों की अहम भूमिका रही। उस दौर में कंपनियां केवल उत्पाद की गुणवत्ता या कीमत के बारे में बताकर ही ग्राहकों को आकर्षित नहीं करती थीं, बल्कि परिवार और भावनाओं से जुड़ी कहानियों का भी सहारा लेती थीं।
रथ के विज्ञापनों में भी घर, परिवार और साथ बैठकर भोजन करने जैसे दृश्यों को जगह दी जाती थी। इन विज्ञापनों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जाती थी कि घर के खाने का स्वाद और परिवार के साथ बिताए पल खास होते हैं।
दूरदर्शन के दौर में ऐसे विज्ञापनों ने ब्रांड को पहचान दिलाने में मदद की। यही वजह है कि पुराने समय के कई उपभोक्ताओं के लिए रथ वनस्पति घी सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि बीते दौर की यादों से जुड़ा नाम भी है।
ट्रेडमार्क से लेकर मालिकाना बदलाव तक का सफर
रथ वनस्पति घी ने समय के साथ बाजार में अपनी पहचान बनाई। उपलब्ध ब्रांड इतिहास के अनुसार, 10 अक्टूबर 1984 को चंडीगढ़ में इसके ट्रेडमार्क का पंजीकरण हुआ था।
हालांकि, 1990 के दशक में कारोबारी परिस्थितियां बदलने लगीं। डीसीएम समूह के भीतर भी बदलाव हुए और रथ ब्रांड के स्वामित्व का सफर आगे बढ़ा।
वर्ष 2000 में सिद्धार्थ श्रीराम से जुड़ी डीसीएम समूह की शाखा ने रथ ब्रांड को कॉनएग्रो फूड्स (ConAgra Foods) को लगभग 120 करोड़ रुपये में बेच दिया। इस बदलाव के साथ ब्रांड के कारोबार को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी नए मालिक के पास चली गई।
इसके बाद वर्ष 2010 में रथ ब्रांड कारगिल इंडिया (Cargill India) के पास पहुंच गया। इस तरह कई दशकों तक भारतीय बाजार में मौजूद रहे ब्रांड का स्वामित्व समय-समय पर बदलता रहा।
जगन्नाथ रथ यात्रा से भी जोड़ने की हुई कोशिश
ब्रांड को उपभोक्ताओं के बीच फिर से चर्चा में लाने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ जुड़ने की रणनीति भी अपनाई गई। कारगिल इंडिया के दौर में ओडिशा की प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा के साथ ब्रांड को जोड़ने और इसके प्रसारण के जरिए लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई।
हालांकि, किसी ब्रांड की लोकप्रियता केवल विज्ञापनों या आयोजनों पर निर्भर नहीं करती। उसकी कीमत, उपलब्धता, उत्पाद के प्रति लोगों का भरोसा और बाजार में मौजूद दूसरे विकल्प भी महत्वपूर्ण होते हैं।
समय के साथ खाद्य तेलों और वनस्पति घी के बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। उपभोक्ताओं की पसंद में भी बदलाव आया। ऐसे में पुराने ब्रांडों के लिए अपनी पहले जैसी लोकप्रियता बनाए रखना आसान नहीं रहा।
आखिर क्यों बदल गई रथ वनस्पति घी की पहचान?
रथ वनस्पति घी का सफर यह दिखाता है कि किसी ब्रांड का लंबे समय तक बाजार में बने रहना और पहले जैसी लोकप्रियता बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं। एक समय घरों में पहचाना जाने वाला यह नाम बदलते कारोबारी माहौल और उपभोक्ता पसंद के बीच नए दौर में पहुंच गया।
आज भी रथ वनस्पति घी का इतिहास भारतीय उपभोक्ता बाजार के बदलावों की एक दिलचस्प मिसाल है। डालडा को चुनौती देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह ब्रांड कभी विज्ञापनों और पारिवारिक भावनाओं के सहारे लोगों तक पहुंचा था। बाद में इसके मालिक बदले और बाजार की परिस्थितियां भी बदलती गईं।
रथ वनस्पति घी की कहानी सिर्फ एक खाद्य उत्पाद की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि समय के साथ बाजार, विज्ञापन और लोगों की पसंद किस तरह बदलते हैं। जो ब्रांड कभी घर-घर में पहचाने जाते थे, उनके लिए भी बदलते दौर के साथ खुद को बनाए रखना जरूरी होता है।







